
भानुप्रतापपुर , 20/05/26 । बस्तर के बदलते स्वरूप की दो अहम तस्वीरें बुधवार को कांकेर जिले से सामने आईं। एक तस्वीर विकास की रही, तो दूसरी बदलाव और विश्वास की। वर्षों से अधूरी पड़ी रावघाट रेल परियोजना आखिरकार अपने अंतिम मुकाम तक पहुंच गई, वहीं कभी रेल परियोजनाओं का विरोध करने वाले आत्मसमर्पित पूर्व नक्सली पहली बार ट्रेन में सफर करते नजर आए।
करीब 21 वर्षों से निर्माणाधीन छत्तीसगढ़ की महत्वाकांक्षी रावघाट रेल परियोजना के अंतिम चरण का ट्रायल सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया। पहली बार ताडोकी से रावघाट तक ट्रेन का ट्रायल रन किया गया। रावघाट इस परियोजना का अंतिम स्टेशन माना जा रहा है। वर्ष 2007 के आसपास शुरू हुई इस परियोजना को नक्सलवाद और सुरक्षा चुनौतियों के कारण पूरा होने में लंबा समय लगा।
इस परियोजना के दौरान कई सुरक्षाबलों के जवान, कर्मचारी और स्थानीय लोगों ने अपनी जान गंवाई, लेकिन तमाम बाधाओं के बावजूद रेल इंजन आखिरकार अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंच गया। इसे बस्तर में विकास की नई रफ्तार के रूप में देखा जा रहा है।
इसी बीच भानुप्रतापपुर से सामने आई दूसरी तस्वीर ने लोगों का ध्यान खींचा। आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटे पूर्व नक्सलियों को जिला पुलिस ने पहली बार रेल यात्रा कराई। ट्रेन में सफर करते समय उनके चेहरों पर खुशी, उत्साह और रोमांच साफ दिखाई दिया।
एक समय ऐसा था जब नक्सल गतिविधियों की आशंका के चलते बस्तर में रेल सेवाएं प्रभावित होती थीं। जगदलपुर-बैलाडीला रेल मार्ग पर कई बार ट्रेनों का संचालन बाधित हुआ और रेल परियोजनाएं नक्सलियों के निशाने पर रहती थीं। लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं।
जो लोग कभी विकास कार्यों के विरोध का प्रतीक माने जाते थे, आज वही विकास की पटरी पर सफर करते दिखाई दिए। यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि बदलते बस्तर की नई कहानी है, जहां अब बंदूक की आवाज से ज्यादा विकास की रफ्तार सुनाई देने लगी है।




