
बुधराम नेताम
बकावंड,13 सितम्बर 2026
ग्राम पंचायत संतोषा-2 में अमृत सरोवर निर्माण से जुड़े 10 मजदूरों की मजदूरी भुगतान में कथित गड़बड़ी का मामला अब बकावंड जनपद पंचायत की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े कर रहा है। मामले को लेकर 1 जून 2025 को अखबार में प्रमुखता से खबर प्रकाशित होने के बावजूद तीन महीने से अधिक समय बीत जाने पर भी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होने से ग्रामीणों और मजदूरों में नाराजगी है।
आरोप है कि अमृत सरोवर निर्माण में पसीना बहाने वाले मजदूरों को उनकी मेहनत की पूरी मजदूरी नहीं मिली। गरीब परिवारों का कहना है कि मजदूरी के भरोसे घर चलाने वाले लोगों को अब कर्ज लेकर परिवार का खर्च उठाना पड़ रहा है। दूसरी ओर जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगने पर कथित तौर पर एक ही जवाब मिलता है—“जांच चल रही है, रिपोर्ट आएगी।”
लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसी कौन-सी जांच है, जिसे पूरा होने में 90 दिन से ज्यादा लग रहे हैं?
खबर छपी, सवाल उठे, लेकिन रिपोर्ट फिर भी फाइलों में कैद!
1 जून 2025 को “सरपंच-सचिव डकार गए गरीब मजदूरों के पसीने की कमाई!” शीर्षक से मामला सामने आने के बाद उम्मीद थी कि प्रशासन तत्काल हरकत में आएगा। मजदूरों की शिकायत, निर्माण कार्य और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की जांच होगी और दोषियों की जिम्मेदारी तय की जाएगी।
लेकिन तीन महीने से ज्यादा समय गुजरने के बाद भी जांच रिपोर्ट सामने नहीं आना अब खुद जांच प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा कर रहा है।
मजदूरों का दर्द अपनी जगह है और विभागीय चुप्पी अपनी जगह। जिन लोगों ने तालाब निर्माण में मेहनत की, उन्हें अपनी ही मजदूरी के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि गरीब मजदूरों को न्याय दिलाने के लिए बनाई गई व्यवस्था आखिर किसके इंतजार में बैठी है?
‘जांच चल रही है’… आखिर कब तक?
ग्रामीणों के अनुसार जब भी वे जनपद पंचायत कार्यालय में मामले की जानकारी लेने पहुंचते हैं, उन्हें जांच जारी होने की बात कही जाती है। मगर जांच की प्रगति क्या है, अब तक क्या-क्या दस्तावेज देखे गए, किससे बयान लिए गए और रिपोर्ट कब आएगी—इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं मिल रहा।
यही वजह है कि ग्रामीणों के बीच यह चर्चा तेज है कि कहीं मामले को समय के साथ ठंडा करने की कोशिश तो नहीं की जा रही?
यदि जांच निष्पक्ष और तेजी से चल रही है तो रिपोर्ट सामने आने में इतनी देरी क्यों? और यदि जांच पूरी नहीं हुई है तो इसकी समय-सीमा तय क्यों नहीं की गई?
तत्कालीन एडीएम की चेतावनी भी क्या बेअसर?
मामले में तत्कालीन एडीएम मनीष वर्मा द्वारा यह बात कही गई थी कि जांच रिपोर्ट नहीं देने पर संबंधित अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई होगी। ऐसे में अब सवाल और गंभीर हो जाता है कि जब रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई तो जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब-तलब और कार्रवाई की स्थिति क्या है?
प्रशासनिक स्तर पर कही गई सख्त बात अगर जमीन पर कार्रवाई में तब्दील नहीं होती, तो उसका संदेश यही जाता है कि गरीब की शिकायत फाइलों में दबकर रह सकती है।
मजदूरों की मेहनत का पैसा कोई मामूली मामला नहीं
अमृत सरोवर जैसी सरकारी योजना में मजदूरों ने काम किया है तो उनकी मजदूरी का भुगतान समय पर और पारदर्शी तरीके से होना चाहिए। यदि भुगतान में वास्तव में गड़बड़ी हुई है तो जिम्मेदारी तय करना प्रशासन का दायित्व है।
और अगर आरोप गलत हैं, तो विभाग को भुगतान से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति साफ करनी चाहिए। आखिर मामला गरीब मजदूरों की मेहनत की कमाई का है, जिसे महज “जांच चल रही है” कहकर अनिश्चितकाल तक नहीं टाला जा सकता।
ब्लॉक स्तर की जांच पर ही उठने लगी उंगली
मजदूरों और ग्रामीणों ने अब मांग की है कि मामले की जांच बकावंड ब्लॉक स्तर से हटाकर जिला स्तर के अधिकारी से कराई जाए, ताकि जांच की निष्पक्षता पर कोई सवाल न उठे।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि जांच में मजदूरी भुगतान में गड़बड़ी प्रमाणित होती है तो संबंधित सरपंच, सचिव, सहायक सचिव अथवा अन्य जिम्मेदार लोगों की भूमिका तय कर राशि की वसूली के साथ नियमानुसार एफआईआर और कार्रवाई की जाए।
फिलहाल संतोषा-2 का यह मामला बकावंड जनपद के लिए एक असहज सवाल बन चुका है—मजदूरों की शिकायत पर खबर छप गई, जांच का आश्वासन भी मिल गया, 90 दिन से ज्यादा गुजर गए… लेकिन जांच रिपोर्ट आखिर कहां है?
गरीब मजदूर आज भी अपने हक की रकम के लिए दर-दर भटक रहे हैं और सरकारी तंत्र के पास अब भी वही पुराना जवाब है—“जांच चल रही है।” सवाल यह है कि जांच कब खत्म होगी और मजदूरों को इंसाफ कब मिलेगा?




