
डमरू कश्यप
बकावंड,13 सितम्बर 2026
बकावंड ब्लॉक में बच्चों के लिए स्वीकृत शौचालय निर्माण की राशि और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर सामने आने के आरोपों ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्ष 2025 में प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में नवीन शौचालय निर्माण के लिए राशि स्वीकृत होने के बावजूद कई स्कूलों में निर्माण कार्य शुरू नहीं होने, अधूरा रहने अथवा मौके पर शौचालय नहीं होने के दावे किए जा रहे हैं।
आरोप है कि कहीं 40 प्रतिशत की पहली किस्त निकल गई, लेकिन निर्माण के नाम पर एक ईंट तक नहीं लगी, तो कहीं पूरी राशि आहरित किए जाने के बावजूद स्कूल परिसर में शौचालय का कोई अता-पता नहीं है। दूसरी ओर, यदि विभागीय पोर्टल पर कार्य पूर्ण दर्शाया गया है और मौके पर निर्माण दिखाई नहीं देता, तो यह स्थिति अपने आप में पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि बच्चों के लिए स्वीकृत पैसा आखिर गया कहां? यदि राशि जारी हुई, तो निर्माण क्यों नहीं हुआ? यदि निर्माण हुआ तो उसका भौतिक सत्यापन किसने किया? और यदि काम पूरा दिखाया गया है तो स्कूलों में उसका वास्तविक ढांचा क्यों नजर नहीं आ रहा?
कागजों में शौचालय, जमीन पर बच्चों की मजबूरी
शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा के लिए भी बच्चों को इंतजार करना पड़े, इससे ज्यादा विडंबनापूर्ण स्थिति क्या होगी। आरोपों के मुताबिक कई स्कूलों में बच्चे आज भी खुले स्थानों का सहारा लेने को मजबूर हैं। बच्चियों के लिए यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि स्कूल में सुरक्षित और उपयोगी शौचालय उनकी बुनियादी जरूरत है।
वर्ष 2025 में स्वीकृत नवीन शौचालय निर्माण के मामले में यदि करीब एक साल बाद भी स्कूलों में काम अधूरा है, तो सवाल सिर्फ निर्माण का नहीं, बल्कि निगरानी, भुगतान और जिम्मेदारी तय करने की पूरी व्यवस्था का है।
बोर्ड लग गया, शौचालय नहीं बना
एक प्रधान पाठक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उनके स्कूल में शौचालय स्वीकृत हुआ था। निर्माण का बोर्ड भी लगा दिया गया, लेकिन वास्तविक निर्माण अब तक नहीं हुआ। पूछने पर सिर्फ यह बताया जाता है कि पैसा आ गया है और काम हो जाएगा।
अब सवाल है कि जब राशि स्वीकृत और जारी हो चुकी है तो काम के लिए बच्चों को कब तक इंतजार करना पड़ेगा? बोर्ड लगाने भर से क्या विकास कार्य पूरा मान लिया जाएगा?
राशि निकली तो जांच भी होनी चाहिए
मामले में उठ रहे आरोपों की सच्चाई सामने लाने के लिए बकावंड ब्लॉक के सभी संबंधित स्कूलों में भौतिक सत्यापन बेहद जरूरी है। प्रत्येक स्कूल के लिए स्वीकृत राशि, जारी किस्त, आहरित रकम, निर्माण की वास्तविक स्थिति, भुगतान से जुड़े दस्तावेज और उपयोगिता प्रमाणपत्र की जांच होनी चाहिए।
यदि किसी स्कूल में राशि आहरित होने के बावजूद काम नहीं हुआ है, तो यह पता लगाना जरूरी है कि राशि किस स्तर पर जारी हुई, किसके माध्यम से खर्च हुई और निर्माण की पुष्टि किस अधिकारी ने की।
शिक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल
बच्चों के स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं के लिए आने वाली राशि की निगरानी की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? यदि अधिकारी और संबंधित एजेंसियां नियमित निरीक्षण करती हैं तो कागज और जमीन की तस्वीर में इतना अंतर कैसे रह गया?
और यदि पोर्टल पर काम पूर्ण दर्शाया गया है, जबकि मौके पर निर्माण नहीं है, तो यह सिर्फ एक निर्माण कार्य की कमी नहीं बल्कि दस्तावेजी सत्यापन और विभागीय मॉनिटरिंग की गंभीर कमजोरी का संकेत हो सकता है।
आदिवासी युवा जिला अध्यक्ष ने की जांच की मांग
आदिवासी युवा जिला अध्यक्ष लखेश्वर कश्यप ने बकावंड ब्लॉक के सभी स्कूलों में शौचालय निर्माण कार्यों का भौतिक सत्यापन कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि निर्माण के लिए स्वीकृत राशि और उसके आहरण से जुड़े दस्तावेजों की जांच होनी चाहिए तथा यदि जांच में गड़बड़ी सामने आती है तो दोषी अधिकारियों, सचिवों और संबंधित ठेकेदारों से राशि की वसूली की जाए।
फिलहाल पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि बच्चों के लिए आया पैसा कागजों में तो दिखाई दे रहा है, लेकिन स्कूलों में शौचालय क्यों नहीं दिखाई दे रहे? यदि आरोप गलत हैं तो विभाग को दस्तावेज और मौके की तस्वीर सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई तय करनी होगी। बच्चों के हक की राशि पर उठे इन सवालों का जवाब अब कागज नहीं, जमीन पर खड़ा शौचालय ही दे सकता है।




