बस्तर दशहरा में अनोखी बेल पूजा की परंपरा, जोड़ी बेल फल से जुड़ी है मां दंतेश्वरी और मां माणिकेश्वरी की कथा

जगदलपुर,18 अक्टूबर 2026
विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा अपनी अनूठी परंपराओं और सदियों पुरानी धार्मिक रस्मों के लिए जाना जाता है। 75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में अष्टमी के अवसर पर बेल पूजा की परंपरा निभाई गई। जगदलपुर से करीब 6 किलोमीटर दूर सरगीपाल गांव में आयोजित इस पूजा का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि जोड़ी बेल फल के माध्यम से मां दंतेश्वरी और मां माणिकेश्वरी को बस्तर दशहरा में शामिल होने का निमंत्रण दिया जाता है।
चालुक्य वंश के राजा से जुड़ी है परंपरा
बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव के अनुसार, बेल पूजा की परंपरा चालुक्य वंश के एक राजा से जुड़ी पौराणिक कथा पर आधारित है। मान्यता के मुताबिक, शिकार के दौरान राजा की मुलाकात बेल वृक्ष के नीचे दो सुंदर कन्याओं से हुई। राजा ने उनसे विवाह करने की इच्छा जताई, जिस पर कन्याओं ने उन्हें बारात लेकर आने को कहा।
अगले दिन जब राजा बारात लेकर पहुंचे, तो दोनों कन्याओं ने स्वयं को मां माणिकेश्वरी और मां दंतेश्वरी के रूप में प्रकट किया। इसके बाद राजा ने क्षमा मांगते हुए दोनों देवियों को बस्तर दशहरा में शामिल होने का निमंत्रण दिया। मान्यता है कि तभी से बेल पूजा की यह परंपरा चली आ रही है।
जोड़ी बेल फल को माना जाता है दोनों देवियों का प्रतीक
जानकार हेमंत कश्यप के अनुसार, जोड़ी बेल फल को मां दंतेश्वरी और मां माणिकेश्वरी का प्रतीक माना जाता है। हर साल बेल न्योता की रस्म के दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य सरगीपाल गांव पहुंचते हैं और पुजारी से विधि-विधान के साथ जोड़ी बेल फल ग्रहण करते हैं।
इसके बाद जोड़ी बेल फल को जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर में श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना के साथ रखा जाता है। यह परंपरा बस्तर की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुई पूजा
इस वर्ष भी सरगीपाल गांव में बेल पूजा की रस्म पारंपरिक रीति-रिवाजों और उत्साह के साथ संपन्न हुई। इस अवसर पर बस्तर राजपरिवार के सदस्यों, दशहरा समिति के प्रतिनिधियों और बड़ी संख्या में ग्रामीणों की मौजूदगी रही। पूजा के दौरान गांव में उत्सव जैसा माहौल देखने को मिला।
बस्तर दशहरा में 12 से अधिक अनूठी धार्मिक रस्में निभाई जाती हैं। ये परंपराएं इस पर्व को देश-दुनिया के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग पहचान देती हैं। बेल पूजा के बाद अब महाअष्टमी की रात निशा जात्रा की रस्म निभाई जाएगी।




