तेंदूपत्ता-शाल बीज के बाद अब ‘बोड़ा’ बना बस्तर के ग्रामीणों की नई कमाई का जरिया

बारिश के साथ जंगलों में शुरू हुई बहुमूल्य मशरूम की खोज, बाजार में 1000 से 1500 रुपये प्रति किलो तक कीमत
डमरू कश्यप
बस्तर 05 जून 2026/ तेंदूपत्ता संग्रहण और शाल बीज सीजन समाप्त होने के बाद अब बस्तर के आदिवासी अंचलों में ग्रामीणों की नजरें जंगलों में उगने वाले बहुमूल्य वन उत्पाद बोड़ा (जंगली मशरूम) पर टिक गई हैं। मानसून की दस्तक के साथ ही जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगने वाले बोड़ा की तलाश शुरू हो गई है। सुबह होते ही ग्रामीण टोकरी और थैले लेकर जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं, जहां उन्हें यह दुर्लभ और स्वादिष्ट वन उपज अच्छी मात्रा में मिलने की उम्मीद रहती है।
बस्तर के घने जंगलों में मिलने वाला बोड़ा अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता और अनोखे स्वाद के लिए प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के कई हिस्सों में प्रसिद्ध है। स्थानीय हाट-बाजारों से लेकर बड़े शहरों के व्यापारियों तक इसकी भारी मांग बनी रहती है। यही कारण है कि बाजार में इसकी कीमत एक हजार रुपये से लेकर पंद्रह सौ रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है। कई बार मांग बढ़ने पर कीमत इससे भी अधिक देखने को मिलती है।
आदिवासी परिवारों के लिए बोड़ा केवल खाद्य पदार्थ नहीं बल्कि आजीविका का मजबूत आधार बन चुका है। ग्रामीण जंगलों से बोड़ा एकत्र कर स्थानीय बाजारों में बेचते हैं, जिससे उन्हें अल्प समय में अच्छी आमदनी प्राप्त होती है। तेंदूपत्ता और शाल बीज के बाद बोड़ा सीजन ग्रामीणों के लिए अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण अवसर लेकर आता है।
जानकारों के अनुसार बस्तर की भौगोलिक परिस्थितियां, घने वन और अनुकूल जलवायु बोड़ा के उत्पादन के लिए बेहद उपयुक्त हैं। इसी वजह से यहां मिलने वाला बोड़ा गुणवत्ता और स्वाद के मामले में विशेष पहचान रखता है। होटल, ढाबों और बड़े बाजारों में इसकी मांग लगातार बनी रहने से ग्रामीणों को इसका अच्छा मूल्य मिल जाता है।
ग्रामीणों का कहना है कि जंगल उनके जीवन और आजीविका का प्रमुख आधार हैं। तेंदूपत्ता, शाल बीज, महुआ, इमली तथा अन्य लघु वनोपजों की तरह बोड़ा भी उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ऐसे में वन संपदा का संरक्षण ग्रामीणों की आजीविका और पर्यावरण दोनों के लिए आवश्यक है।
बस्तर के जंगल केवल हरियाली और जैव विविधता की पहचान नहीं हैं, बल्कि हजारों आदिवासी परिवारों की रोजी-रोटी का आधार भी हैं। तेंदूपत्ता और शाल बीज के बाद अब बोड़ा सीजन ग्रामीणों के चेहरों पर नई उम्मीद और आर्थिक संबल लेकर आया है। यदि वन संपदा का संरक्षण और उचित बाजार व्यवस्था सुनिश्चित हो, तो बोड़ा जैसे वन उत्पाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और अधिक मजबूती प्रदान कर सकते हैं।




