ताड़मेटला हमले में 10 आरोपियों की बरी बरकरार, हाईकोर्ट बोला- सीधे सबूत नहीं; 76 जवानों की शहादत पर भी संदेह के आधार पर सजा नहीं

रायपुर, 08 मई 2026/छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ताड़मेटला नक्सली हमले मामले में राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए 10 आरोपियों की बरी को बरकरार रखा है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने 5 मई को दिए आदेश में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा और ट्रायल कोर्ट का फैसला गलत या मनमाना नहीं माना जा सकता।
मामला 6 अप्रैल 2010 को दक्षिण बस्तर के ताड़मेटला जंगल में हुए उस भीषण हमले से जुड़ा है, जिसमें क्षेत्र वर्चस्व अभियान पर निकले सीआरपीएफ और पुलिस जवानों पर नक्सलियों ने घात लगाकर हमला किया था। अभियोजन के अनुसार इस हमले में 76 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे। साथ ही हथियार लूटे गए और घटनास्थल पर विस्फोटक लगाए गए थे।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने महत्वपूर्ण सबूतों को नजरअंदाज किया, जिनमें एक आरोपी का धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज कथित कबूलनामा, टिफिन बम और विस्फोटक सामग्री की बरामदगी तथा हमले से जुड़ी परिस्थितियां शामिल थीं। सरकार ने यह भी कहा कि घायल सीआरपीएफ जवानों को प्रत्यक्षदर्शी के रूप में पेश करने की मांग को गलत तरीके से खारिज किया गया।
हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों की पहचान और उनके खिलाफ ठोस corroborative evidence पेश नहीं कर सका। अदालत ने पाया कि सभी गवाह hostile हो गए, किसी प्रत्यक्षदर्शी ने आरोपियों की पहचान नहीं की और उनके कब्जे से कोई हथियार या विस्फोटक बरामद नहीं हुआ।
बेंच ने यह भी कहा कि एफएसएल रिपोर्ट पेश नहीं की गई, आर्म्स एक्ट के तहत अनिवार्य स्वीकृति नहीं ली गई और कथित कबूलनामे की स्वतंत्र पुष्टि भी नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने एक तार्किक और संभव दृष्टिकोण अपनाया था, जबकि परिस्थितियों की श्रृंखला अधूरी रही।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि इतने बड़े हमले और जानमाल के नुकसान के बावजूद केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती, बल्कि इसके लिए कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य जरूरी हैं।
हाईकोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर चिंता जताते हुए कहा कि इतने गंभीर मामले में वास्तविक आरोपियों की पहचान नहीं हो सकी। साथ ही भविष्य में बड़े अपराधों की जांच में बेहतर फोरेंसिक साक्ष्य संग्रह, गवाहों के परीक्षण और प्रक्रियागत नियमों के सख्त पालन की जरूरत पर जोर दिया।
राज्य सरकार की अपील खारिज होने के साथ ही ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई बरी बरकरार रहेगी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले की प्रति राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों और ट्रायल कोर्ट को भेजने के निर्देश भी दिए हैं।




