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करपावंड में भूमि विवाद पर ग्रामीणों का पलटवार: बोले—‘एकतरफा कार्रवाई नहीं चलेगी’, निष्पक्ष जांच और सीमांकन की उठाई मांग

जगदलपुर, 25 जून 2026। बस्तर जिले के ग्राम पंचायत करपावंड में भूमि विवाद को लेकर गुरुवार को जिला पत्रकार संघ भवन में ग्रामीणों एवं छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज युवा प्रभाग द्वारा पत्रकार वार्ता आयोजित कर अपना पक्ष रखा गया। पत्रकार वार्ता में बड़ी संख्या में महिला एवं पुरुष ग्रामीण शामिल हुए। इस दौरान ग्रामीणों ने विवादित भूमि के निष्पक्ष सीमांकन, राजस्व अभिलेखों की जांच तथा पूरे मामले की पारदर्शी जांच कराने की मांग उठाई।

छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज युवा प्रभाग के जिला अध्यक्ष लखेश्वर कश्यप ने कहा कि करपावंड भूमि विवाद को एकतरफा तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि ग्रामीण लंबे समय से राजस्व रिकॉर्ड में कथित त्रुटियों के सुधार और निष्पक्ष सीमांकन की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि बंदोबस्त के दौरान तैयार नक्शों और वर्तमान राजस्व अभिलेखों में कई विसंगतियां हैं, जिसके कारण भूमि की वास्तविक स्थिति को लेकर भ्रम बना हुआ है।

ग्रामीणों ने बताया कि पुराने और वर्तमान खसरों के रकबे एवं स्थिति में अंतर दिखाई देता है, जिससे गांव में लगातार विवाद की स्थिति उत्पन्न हो रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस संबंध में कई बार कलेक्टर, एसडीएम और तहसीलदार को ज्ञापन सौंपे जाने के बावजूद अब तक संपूर्ण विवादित भूमि का निष्पक्ष सीमांकन नहीं कराया गया है।

पत्रकार वार्ता में मौजूद महिलाओं ने भी प्रशासन से शीघ्र कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि गांव में शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए विवादित भूमि का सीमांकन कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। उनका कहना था कि कई बार अधिकारियों से गुहार लगाने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है।

ग्रामीणों ने बताया कि 15 जून 2026 को कलेक्टर बस्तर को सौंपे गए ज्ञापन में विवादित भूमि का सीमांकन, राजस्व अभिलेखों की जांच तथा बंदोबस्त के दौरान हुई कथित त्रुटियों के सुधार की मांग की गई थी। ज्ञापन में यह भी कहा गया था कि वास्तविक स्थिति स्पष्ट किए बिना किसी भी प्रकार की कार्रवाई भविष्य में और अधिक विवाद को जन्म दे सकती है।

पत्रकार वार्ता में ग्रामीणों ने हाल ही में हुई प्रशासनिक कार्रवाई का भी उल्लेख किया। ग्रामीणों के अनुसार जिस भूमि को खाली कराने के लिए राजस्व अमला पहुंचा था, वह खसरा क्रमांक 567/2 की भूमि है, जिसे गांव के लोग पूर्व से शासकीय भूमि बताते आ रहे हैं। वहीं प्रशासनिक पक्ष का कहना है कि न्यायालय के आदेश के तहत संबंधित भूमि पर कब्जा दिलाने की कार्रवाई की जा रही थी।

राजस्व विभाग के अनुसार कार्रवाई से पहले संबंधित पक्षों को नियमानुसार नोटिस जारी कर सूचना दी गई थी, लेकिन मौके पर विरोध हुआ और स्थिति विवाद में बदल गई। विभाग का आरोप है कि शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाते हुए धक्का-मुक्की और मारपीट की गई, जिसके बाद पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।

दूसरी ओर ग्रामीणों ने इन दावों का खंडन करते हुए कहा कि कार्रवाई की पूर्व सूचना गांव के जिम्मेदार लोगों को नहीं दी गई थी। उनका कहना है कि न तो कोटवार, न पुजारी और न ही ग्राम पंचायत के प्रतिनिधियों को इस संबंध में स्पष्ट जानकारी दी गई थी। ग्रामीणों का दावा है कि यदि सभी पक्षों की मौजूदगी में सीमांकन और कार्रवाई की जाती तो विवाद की स्थिति उत्पन्न नहीं होती।

घटना के बाद राजस्व अधिकारियों एवं शासकीय कर्मचारियों के साथ मारपीट तथा शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाने के आरोप में पुलिस ने मामला दर्ज किया है। मामले में सरपंच सहित कई लोगों पर भीड़ को उकसाने और नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए गए हैं। पुलिस कार्रवाई के तहत 12 लोगों को गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजा गया है।

वहीं ग्रामीणों एवं सर्व आदिवासी समाज का कहना है कि पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जानी चाहिए, ताकि विवाद की वास्तविक वजह सामने आ सके। संगठन ने प्रशासन से मांग की है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी पक्षों को सुना जाए तथा विवादित भूमि का पुनः सीमांकन कराया जाए।

ग्रामीणों ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष का विरोध करना नहीं, बल्कि गांव में शांति बनाए रखते हुए भूमि विवाद का स्थायी समाधान निकालना है। उन्होंने प्रशासन से पूरे मामले की जांच कर तथ्य सार्वजनिक करने की मांग की, ताकि भविष्य में किसी प्रकार का तनाव या भ्रम उत्पन्न न हो।

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