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बस्तर दशहरा में शामिल हुईं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, जनजातीय संस्कृति की सराहना, मांझी-चालकी का बढ़ा मानदेय

जगदलपुर, 23 अक्टूबर 2026

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु आज छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में आयोजित विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा उत्सव में शामिल हुईं। इस अवसर पर उन्होंने बस्तर की विशिष्ट धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं, जनजातीय विरासत और सामूहिक सहभागिता की सराहना की। राष्ट्रपति ने कहा कि लगभग 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा सामाजिक समरसता, सामूहिक आस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों का जीवंत प्रतीक है। वहीं, मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कहा कि हिंसक माओवाद से मुक्त होकर बस्तर अब नवनिर्माण और विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

कार्यक्रम में राज्यपाल श्री रमेन डेका, मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय, संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल सहित अनेक जनप्रतिनिधि और पारंपरिक मांझी-चालकी उपस्थित रहे। इस दौरान बस्तर की समृद्ध संस्कृति, जनजातीय समाज की भूमिका, लोकतांत्रिक परंपराओं और क्षेत्र में हो रहे विकास कार्यों पर प्रकाश डाला गया।

मुरिया दरबार लोकतांत्रिक परंपराओं का उत्कृष्ट उदाहरण: राष्ट्रपति

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने मुरिया दरबार की परंपरा को जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि इस परंपरा में समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर जनसमस्याओं, आवश्यकताओं और सामाजिक विषयों पर विचार-विमर्श करते हैं। सामूहिक संवाद से निकले समाधान समाज में खुशहाली, आपसी सहयोग और एकता को मजबूत करते हैं।

उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा की विशेषता यह है कि इसमें विभिन्न गोत्रों, समुदायों और समाज के सभी वर्गों की सक्रिय भागीदारी रहती है। रथ निर्माण से लेकर रथ खींचने, पूजा-अर्चना और विभिन्न अनुष्ठानों तक प्रत्येक समुदाय अपनी पारंपरिक जिम्मेदारी निभाता है। यह परंपरा सामाजिक एकता, आपसी सहयोग और सांस्कृतिक निरंतरता का अनूठा उदाहरण है।

राष्ट्रपति ने बताया कि लगभग दो माह पहले राष्ट्रपति भवन में बस्तर के प्रतिनिधिमंडल से उनकी मुलाकात हुई थी। इसमें बस्तर पंडुम के विजेताओं के साथ परगना मांझी और चालकी भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि बस्तर पंडुम जैसे आयोजन जनजातीय युवाओं को अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों और परंपराओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

जनजातीय प्रतिभाओं को मिले उचित अवसर

राष्ट्रपति ने कहा कि जनजातीय समाज में अपार प्रतिभा और संभावनाएं हैं। उचित अवसर, प्रोत्साहन और संसाधन मिलने पर जनजातीय समाज के बेटे-बेटियां जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में देश का गौरव बढ़ा सकते हैं। उन्होंने बस्तर ओलंपिक में जनजातीय युवाओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी की सराहना करते हुए कहा कि खेल प्रतिभाओं को उचित मंच मिलने से बस्तर के युवा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकते हैं और ओलंपिक जैसे प्रतिष्ठित आयोजनों में पदक जीतकर देश का मान बढ़ा सकते हैं।

राष्ट्रपति ने छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद की समस्या से मुक्ति तथा सुरक्षा और विकास के क्षेत्र में हो रहे बदलावों का उल्लेख किया। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार के समन्वित प्रयासों की सराहना करते हुए विश्वास जताया कि बस्तर के युवा और जनजातीय समुदाय के लोग अपनी प्रतिभा, परिश्रम और सहभागिता से देश की विकास यात्रा में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

दंडकारण्य की सांस्कृतिक स्मृतियों में बसी है बस्तर की विरासत

राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु ने बस्तर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि रामायण में इस क्षेत्र का संबंध दंडकारण्य से जोड़ा जाता है। भगवान श्रीराम के वनवास से संबंधित अनेक प्रसंग इस अंचल की सांस्कृतिक स्मृतियों में मौजूद हैं। माता शबरी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज की सांस्कृतिक विरासत भारतीय परंपरा का अभिन्न अंग है।

उन्होंने भगवान श्रीराम के आदर्शों, माता सीता की पवित्रता और माता शबरी की भक्ति से प्रेरणा लेकर समाज में नैतिकता, मर्यादा और मानवीय मूल्यों को अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि बस्तर की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।

प्रकृति संरक्षण जनजातीय जीवन दर्शन का अभिन्न हिस्सा

राष्ट्रपति ने जनजातीय समाज की प्रकृति पूजा की परंपरा की सराहना करते हुए कहा कि पेड़-पौधों, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान इस समाज की विशिष्ट पहचान है। जनजातीय परंपराओं में पेड़-पौधों को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदाता के रूप में देखा जाता है।

उन्होंने कहा कि प्रकृति हमें ऑक्सीजन, जल, फल, फूल, भोजन और औषधियां प्रदान करती है। इसलिए प्रकृति की पूजा के साथ-साथ उसका संरक्षण और संवर्धन भी जरूरी है। जंगल, पहाड़ और प्राकृतिक संसाधन अमूल्य धरोहर हैं। इनका उपयोग आवश्यकता के अनुरूप करते हुए इनके संरक्षण की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए।

राष्ट्रपति ने सभी नागरिकों, विशेषकर जनजातीय समाज के लोगों से अधिक से अधिक पौधे लगाने और जंगलों को हरा-भरा बनाए रखने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जनजातीय उद्यमियों को वित्तीय सुविधाओं और बाजार से जोड़ने के प्रयास समावेशी विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में जनजातीय समाज की भागीदारी और मजबूत होनी चाहिए।

बस्तर दशहरा की परंपराओं का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने कुटुम्ब जात्रा के माध्यम से ग्राम देवी-देवताओं की विदाई और 27 अक्टूबर को मां दंतेश्वरी तथा देवी मावली की डोली विदाई जैसे आयोजनों को इस उत्सव की विशिष्ट धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान बताया। उन्होंने मां दंतेश्वरी से बस्तरवासियों के उज्ज्वल भविष्य, छत्तीसगढ़ की प्रगति और समग्र विकास की कामना की।

राज्यपाल रमेन डेका ने की बस्तर दशहरा की परंपराओं की सराहना

राज्यपाल श्री रमेन डेका ने बस्तर दशहरा और विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और लोकतांत्रिक मूल्य हमारी सभ्यता एवं संस्कारों में गहराई से रचे-बसे हैं। उन्होंने कहा कि सामूहिकता जनजातीय समाज की जीवन पद्धति का अभिन्न हिस्सा है। गांवों में सामाजिक निर्णय मिल-बैठकर लिए जाते हैं और प्रत्येक व्यक्ति की आवाज को सम्मान दिया जाता है।

राज्यपाल ने कहा कि बस्तर दशहरा समाज को साथ लेकर चलने की सीख देता है। रथ के लिए लकड़ी लाने से लेकर उसके निर्माण और संचालन तक विभिन्न गांवों और समुदायों के लोग अपनी निर्धारित जिम्मेदारियां निभाते हैं। राजशाही समाप्त होने के बाद भी यह परंपरा निरंतर जारी रही और जनतांत्रिक संवाद के सशक्त मंच के रूप में विकसित हुई।

उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा और मुरिया दरबार यह संदेश देते हैं कि संवाद ही समाधान का मार्ग है। शासन और समाज जब आमने-सामने बैठकर चर्चा करते हैं, तब कठिन समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है।

माओवाद से मुक्त बस्तर में नवनिर्माण और विकास की बारी: मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का मां दंतेश्वरी की पावन भूमि जगदलपुर में स्वागत एवं अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति का बस्तर की धरती से गहरा जुड़ाव रहा है। इसी वर्ष फरवरी में उन्होंने बस्तर पंडुम का शुभारंभ किया था। इसके बाद आयोजन के विजेताओं को सम्मानित करने के साथ राष्ट्रपति भवन आमंत्रित कर उनका उत्साहवर्धन भी किया था।

मुख्यमंत्री ने कहा कि राष्ट्रपति की उपस्थिति से बस्तरवासियों का उत्साह बढ़ा है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा बस्तर की लोक संस्कृति का आईना है। इसकी परंपराएं जनजातीय समाज के समतामूलक विचारों, सामूहिक सहभागिता और आपसी विश्वास को प्रदर्शित करती हैं।

उन्होंने कहा कि इस वर्ष बस्तर दशहरा विशेष महत्व रखता है। एक ओर राष्ट्रपति की गरिमामय उपस्थिति से उत्सव की प्रतिष्ठा बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर बस्तर हिंसक माओवाद से मुक्त होकर नवनिर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजन इस परिवर्तन को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

सड़क, रेल, स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं के विस्तार पर जोर

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार ने बस्तर की समृद्धि और विकास के लिए स्पष्ट रोडमैप तैयार किया है। नियद नेल्लानार योजना के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों तक शासकीय योजनाओं का लाभ पहुंचाया जा रहा है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और पीएम-जनमन योजना के तहत अंदरूनी बसाहटों को सड़क मार्ग से जोड़ने का काम किया जा रहा है। जहां सड़कें बन चुकी हैं, वहां मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना के माध्यम से परिवहन सुविधाओं के विस्तार के प्रयास किए जा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि रायपुर से रावघाट तक नई रेल सेवा शुरू की गई है और रावघाट-जगदलपुर रेल लाइन पर काम जारी है। रायपुर से विशाखापट्टनम एक्सप्रेसवे का बड़ा हिस्सा बस्तर क्षेत्र से गुजरता है। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए होम-स्टे की व्यवस्था हेतु विशेष प्रावधान किए गए हैं। वहीं, वन धन केंद्रों के माध्यम से वनोपज संग्राहकों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने बताया कि जगदलपुर में सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल शुरू किया गया है तथा गीदम में मेडिकल कॉलेज इसी शैक्षणिक सत्र से प्रारंभ हो गया है। ओरछा और जगरगुंडा में एजुकेशन सिटी विकसित करने का काम किया जा रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि राष्ट्रपति के मार्गदर्शन से बस्तर को देश का अग्रणी संभाग बनाने और विकसित छत्तीसगढ़ के संकल्प को पूरा करने के प्रयासों को मजबूती मिलेगी।

मांझियों और चालकी का मासिक मानदेय बढ़ा

संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल ने मां दंतेश्वरी, मां मावली और बस्तर अंचल के समस्त ग्राम देवी-देवताओं को नमन करते हुए राष्ट्रपति का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि बस्तर दशहरा अपनी अवधि, विशिष्ट परंपराओं, आस्था और व्यापक जनभागीदारी के कारण देश के अन्य उत्सवों से अलग पहचान रखता है। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर की जीवंत सांस्कृतिक पहचान है।

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ने परंपरागत प्रतिनिधियों के सम्मान और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसके तहत मांझियों का मासिक मानदेय 2,000 रुपये से बढ़ाकर 5,000 रुपये और चालकी का मानदेय 1,500 रुपये से बढ़ाकर 3,500 रुपये कर दिया गया है।

यह निर्णय बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने वाले पारंपरिक प्रतिनिधियों के योगदान के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है।

कई जनप्रतिनिधि और अधिकारी रहे मौजूद

कार्यक्रम में उप मुख्यमंत्री श्री विजय शर्मा, वन मंत्री श्री केदार कश्यप, कृषि मंत्री श्री राम विचार नेताम, शिक्षा मंत्री श्री गजेंद्र यादव, महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती लक्ष्मी राजवाड़े, बस्तर सांसद एवं बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष श्री महेश कश्यप, कांकेर सांसद श्री भोजराज नाग, जगदलपुर विधायक श्री किरण सिंह देव, कोंडागांव विधायक सुश्री लता उसेंडी और महापौर श्री संजय पांडे सहित अनेक जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।

इस दौरान मुख्यमंत्री के सचिव श्री राहुल भगत, कमिश्नर श्री डोमन सिंह, आईजी श्री बीएन मीणा, कलेक्टर श्री आकाश छिकारा, एसपी श्री शलभ सिन्हा, पारंपरिक मांझी-चालकी, मेंबर-मेंबरिन, नाइक-पाइक, बस्तर दशहरा समिति के सदस्य और बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।

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