खैरगुड़ा में महिलाओं ने संभाली धान रोपाई की कमान, लोकगीतों की गूंज के बीच सहेज रहीं खेती की परंपरा

बस्तर, 19 जुलाई 2026
बस्तर। मानसून की रफ्तार के साथ बस्तर विकासखंड के ग्राम मधोता-02 के खैरगुड़ा में धान रोपाई का कार्य पूरे उत्साह के साथ जारी है। इस बार खेतों में सुबह से शाम तक महिलाओं की टोलियां नंगे पांव कीचड़ में उतरकर धान की पौध रोप रही हैं। रोपाई के दौरान ददरिया और जगारगीत की गूंज से पूरा खेत सांस्कृतिक रंग में सराबोर नजर आ रहा है।
खैरगुड़ा में धान रोपाई केवल कृषि कार्य नहीं, बल्कि सामूहिक सहयोग और लोक परंपरा का जीवंत उदाहरण बन गई है। महिलाएं समूह बनाकर पहले नर्सरी से पौध उखाड़ती हैं, फिर उसकी गड्डियां तैयार कर कतारबद्ध तरीके से खेतों में रोपाई करती हैं। इस दौरान बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी को खेती की पारंपरिक तकनीकों के साथ-साथ लोकगीतों की विरासत भी सिखा रही हैं।
गांव की महिलाएं घरेलू कार्य पूरा करने के बाद टिफिन लेकर खेतों की ओर निकल जाती हैं। दोपहर में थोड़े विश्राम के बाद देर शाम तक रोपाई का काम जारी रहता है। कई महिलाएं अपने छोटे बच्चों को भी साथ लाती हैं, जो खेत की मेड़ पर खेलते रहते हैं। गांव में आज भी सामूहिक श्रम की परंपरा कायम है, जिसके तहत पहले एक किसान और फिर दूसरे किसान के खेत में मिलकर रोपाई की जाती है। इससे कम समय में सभी खेतों की रोपाई पूरी हो जाती है और आपसी भाईचारा भी मजबूत होता है।
किसान मंदना ठाकुर ने बताया कि समय पर धान रोपाई पूरे वर्ष की आजीविका और खाद्यान्न सुरक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जहां पुरुष जुताई और सिंचाई का कार्य संभालते हैं, वहीं रोपाई की सबसे बड़ी जिम्मेदारी महिलाओं पर होती है। खैरगुड़ा की महिलाएं रोपाई में दक्ष मानी जाती हैं और उन्हें पौध की उचित गहराई एवं दूरी बनाए रखने का वर्षों का अनुभव है, जिससे बेहतर उत्पादन मिलता है।
गांव की कई महिलाएं पिछले तीन दशकों से इस कार्य से जुड़ी हुई हैं। अब युवा पीढ़ी की लड़कियां भी अपनी मां और दादी के साथ खेतों में उतरकर खेती की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। प्रिया बघेल, कुसुमलता, सत्यबती और सुंदरी बाई का कहना है कि लोकगीत गाते हुए काम करने से थकान महसूस नहीं होती और पूरा दिन उत्साह के साथ बीत जाता है।
बस्तर की कृषि व्यवस्था आज भी महिलाओं और पुरुषों की संयुक्त मेहनत, अनुभव और परंपरागत ज्ञान पर आधारित है। खैरगुड़ा की महिलाएं अपनी मेहनत, समर्पण और सांस्कृतिक जुड़ाव के माध्यम से यह संदेश दे रही हैं कि खेती केवल रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता की मजबूत नींव भी है।




