छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: तलाक के बिना दूसरी शादी अमान्य, भरण-पोषण की मांग खारिज

बिलासपुर। पति से भरण-पोषण के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि पहली शादी के कानूनी रूप से अस्तित्व में रहते हुए दूसरी शादी करना वैध नहीं है। ऐसी स्थिति में दूसरे पति से गुजारा-भत्ता की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट ने महिला की अपील खारिज कर दी।

मामले की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा ने कहा कि दूसरी शादी करने से पहले पहले पति से विधिवत तलाक लेना आवश्यक है। बिना तलाक दूसरी शादी कर भरण-पोषण की मांग करना कानूनसम्मत नहीं है।

क्या है पूरा मामला?

दुर्ग-भिलाई की रहने वाली महिला ने फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर की थी। महिला ने अपने दूसरे पति के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की अर्जी लगाई थी। उसका दावा था कि 10 जुलाई 2020 को आर्य समाज मंदिर में विवाह हुआ था।

महिला ने आरोप लगाया कि शादी के कुछ समय बाद पति ने उसे शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया और घर से निकाल दिया। उसने पति की आय 5 लाख रुपए प्रतिमाह बताते हुए 1 लाख रुपए मासिक गुजारा-भत्ता की मांग की थी।

सुनवाई में खुला पहला विवाह का तथ्य

सुनवाई के दौरान सामने आया कि महिला की पहली शादी अब भी कानूनी रूप से विद्यमान है और पहला पति जीवित है। महिला ने स्वीकार किया कि पहली शादी से उसके दो बालिग बेटे हैं, जो उसके साथ रहते हैं। उसने पहले पति से कानूनी तलाक लिए बिना ही दूसरी शादी कर ली थी।

फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार

फैमिली कोर्ट ने पाया था कि महिला ने स्वयं को अविवाहित बताकर दूसरी शादी की थी, जबकि पहली शादी समाप्त नहीं हुई थी। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि महिला पूर्व में आशा वर्कर के रूप में कार्य कर चुकी है और शारीरिक रूप से सक्षम है, इसलिए स्वयं अपना भरण-पोषण कर सकती है।

हाईकोर्ट ने 20 जनवरी 2026 के फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि उसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। इसी आधार पर महिला की अपील खारिज कर दी गई।


डिजिटल साक्ष्यों पर भी हाईकोर्ट का अहम रुख

इससे पहले भी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में डिजिटल साक्ष्यों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया था। जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की एकलपीठ ने कहा था कि निष्पक्ष सुनवाई के हित में निजी डिजिटल दस्तावेज—जैसे व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग—को साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है, यदि वे मामले के निपटारे में सहायक हों।

हाईकोर्ट के इन फैसलों से स्पष्ट है कि वैवाहिक मामलों में कानूनी प्रक्रिया और तथ्यों की पारदर्शिता को सर्वोपरि माना जाएगा।

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