
बकावंड,6 सितंबर 2026
बस्तर जिले के बकावंड ब्लॉक का मैलबेड़ा गांव आज भी प्रकृति के अनमोल खजाने को संजोए हुए है। गांव के आसपास करीब 15 किलोमीटर के दायरे में फैला घना जंगल ग्रामीणों की आजीविका का प्रमुख आधार है। करपावंड से लेकर उड़ीसा के कनकी, धनपुर, मोखागांव, तोरेंगा, मुंडागुड़ा, पाथरी और चलानगुड़ा तक फैले इस वन क्षेत्र की प्राकृतिक विविधता इसे खास बनाती है।
इस जंगल की प्रमुख पहचान कुल्लू का पेड़ और उसका फल है। ग्रामीणों के अनुसार, सदियों से जंगल उन्हें कुल्लू फल और कुल्लू गोंद उपलब्ध कराता आ रहा है, जो उनकी परंपरा के साथ-साथ आर्थिक जीवन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। मौसम के अनुसार यहां विभिन्न प्रकार के जंगली फल और फूल भी पाए जाते हैं।
मैलबेड़ा का जंगल औषधीय पौधों और दुर्लभ जड़ी-बूटियों के लिए भी जाना जाता है। गांव के बुजुर्गों और पारंपरिक वैद्यों के पास इन वनस्पतियों की पहचान और उपयोग से जुड़ा पारंपरिक ज्ञान मौजूद है। यह ज्ञान पीढ़ियों से आगे बढ़ता आया है और स्थानीय समुदाय के लिए महत्वपूर्ण धरोहर माना जाता है।
घना जंगल वन्यजीवों के लिए भी सुरक्षित आश्रय बना हुआ है। ग्रामीणों के अनुसार, जंगल के भीतर कई दुर्लभ वन्यजीव दिखाई देते हैं। जंगल के कई हिस्से इतने घने हैं कि दिन में भी वहां अंधेरा छाया रहता है, जिससे इसकी रहस्यमयी प्रकृति और बढ़ जाती है।
मैलबेड़ा के ग्रामीणों का जंगल के साथ गहरा और पारंपरिक रिश्ता है। स्थानीय मान्यताओं और देवगुड़ी व्यवस्था के माध्यम से समुदाय जंगल के संरक्षण में भी भूमिका निभाता है। जैव-विविधता से समृद्ध इस क्षेत्र और यहां मौजूद पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने के लिए विशेष प्रयास किए जाने की जरूरत है।




