बस्तर दशहरा की अंतिम रस्म पूरी, पूजा-अर्चना और विशाल कलश यात्रा के बाद दंतेवाड़ा के लिए विदा हुई मावली माता की डोली

जगदलपुर,27 अक्टूबर 2026
छत्तीसगढ़ की आस्था, परंपरा और संस्कृति का प्रतीक विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा मंगलवार को अपनी अंतिम रस्म के साथ संपन्न हो गया। 75 दिनों तक चलने वाले इस ऐतिहासिक पर्व के समापन पर जगदलपुर के गीदम रोड स्थित जिया डेरा मंदिर में मावली माता की डोली विदाई की रस्म विधि-विधान से निभाई गई। पूजा-अर्चना, विशाल कलश यात्रा और गाजे-बाजे के बीच माता की डोली को विदाई दी गई। इस भावुक अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे और नम आंखों से माता को विदा किया।
परंपरा के अनुसार निभाई गई डोली विदाई की रस्म
परंपरा के अनुसार, बस्तर के राजा अन्नम देव के समय से मावली माता की डोली को विदाई देने की रस्म निभाई जाती रही है। पहले यह आयोजन बेहद सादगी से होता था और इसकी जानकारी भी बहुत कम लोगों तक पहुंच पाती थी। वर्ष 2006 में तत्कालीन कमिश्नर जीएस मिश्रा ने इस परंपरा को भव्य रूप देने की पहल की। उनका मानना था कि जब मावली माता का बस्तर आगमन इतने धूमधाम से होता है, तो उनकी विदाई भी उसी भव्यता के साथ होनी चाहिए। इसके बाद से डोली विदाई को उत्सव के रूप में मनाने की परंपरा आगे बढ़ती गई।
पूजा-अर्चना और कलश यात्रा में शामिल हुए श्रद्धालु
इस वर्ष भी परंपरा का निर्वहन करते हुए बस्तर राज परिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव, माटी पुजारी और स्थानीय लोगों ने मावली माता की पूजा-अर्चना की। इसके बाद गाजे-बाजे के साथ विशाल कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया। इस दौरान माता की डोली को बंदूक से सलामी दी गई और विधि-विधान के साथ दंतेवाड़ा के लिए विदा किया गया।
मावली परघाव से शुरू होकर विदाई पर संपन्न होता है पर्व
बस्तर दशहरा के दौरान मावली परघाव की रस्म में मावली माता की डोली का भव्य स्वागत किया जाता है। इसके बाद डोली को मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में रखा जाता है, जहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में माता के दर्शन करते हैं।
डोली विदाई की अंतिम रस्म पूरी होने के साथ ही 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा पर्व संपन्न हो गया। यह पर्व बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं का प्रतीक है।




