
बकावंड,29 अगस्त 2026
बस्तर जिले में नशे के खिलाफ जागरूकता अभियान और नशा मुक्ति शिविरों का आयोजन लगातार किया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर पूरी तरह दिखाई नहीं दे रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई दुकानों पर तंबाकू, गुटखा, गुड़ाखू और शराब की बिक्री की शिकायतें सामने आ रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब नशीले पदार्थ आसानी से उपलब्ध रहेंगे, तो नशामुक्ति अभियान कितना प्रभावी हो पाएगा।
स्थानीय लोगों का कहना है कि नशा छोड़ने की अपील के साथ-साथ नशीले पदार्थों की उपलब्धता पर रोक लगाना भी जरूरी है। गांवों की छोटी-बड़ी दुकानों पर गुटखा, तंबाकू और गुड़ाखू आसानी से मिलने से विशेषकर युवा वर्ग इसके सेवन की चपेट में आ रहा है। वहीं शराब की उपलब्धता और सेवन को लेकर भी ग्रामीण क्षेत्रों में चिंता बनी हुई है।
युवा पीढ़ी सबसे ज्यादा प्रभावित
आज के समय में कई युवा एक-दूसरे को देखकर नशे की शुरुआत कर रहे हैं। शुरुआत अक्सर तंबाकू, गुटखा या गुड़ाखू से होती है और धीरे-धीरे कुछ युवा अन्य नशीले पदार्थों की ओर भी बढ़ जाते हैं। इसका असर उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और पारिवारिक जीवन पर पड़ रहा है।
सामाजिक कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों का कहना है कि नशा मुक्ति केवल शिविर लगाने से संभव नहीं होगी। इसके लिए नशीले पदार्थों की बिक्री और उपलब्धता पर भी प्रभावी कार्रवाई जरूरी है।
पहले बिक्री पर लगे रोक, फिर सार्थक होगा अभियान
ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन और संबंधित विभाग यदि वास्तव में बस्तर को नशामुक्त बनाने की दिशा में गंभीर हैं, तो गांव-गांव दुकानों की जांच कर नशीले पदार्थों की बिक्री पर सख्ती से रोक लगानी चाहिए। नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि युवाओं तक नशीले पदार्थों की आसान पहुंच खत्म हो सके।
बुधराम नेताम ने सरकार और प्रशासन से अपील की है कि नशीले पदार्थों की बिक्री पर प्रभावी तरीके से रोक लगाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। उनका कहना है कि यदि गांवों में नशे की उपलब्धता कम होगी, तो बड़ी संख्या में युवाओं का भविष्य बचाया जा सकता है। युवा पीढ़ी को नशे की गिरफ्त से बाहर निकालना ही बस्तर के विकास की मजबूत नींव बन सकता है।





