मधोता में रियासतकालीन इतिहास और आस्था की पहचान, दुर्गोत्सव का 16वां वर्ष

बस्तर,12 अक्टूबर 2026
बस्तर अंचल का मधोता गांव अपने रियासतकालीन इतिहास, धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए विशेष पहचान रखता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, मधोता रियासतकाल में बस्तर की राजधानी रहा है और ‘आधा गढ़ मधोता’ के नाम से प्रसिद्ध है। ऐतिहासिक विरासत के साथ यहां की धार्मिक आस्था भी पीढ़ियों से ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।
गांव में बाबा भैरम और तपेश्वरी माता प्रमुख आराध्य देवी-देवताओं के रूप में पूजे जाते हैं। ग्रामीणों की इनके प्रति गहरी आस्था है। प्राकृतिक और धार्मिक दृष्टि से भी मधोता का विशेष महत्व है। यहां कुंड से निकलने वाला बहता पानी भोलेनाथ के चरणों को पखारते हुए आगे मार्कंडेय नदी में गिरता है। यह स्थल स्थानीय आस्था और क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत से जुड़ा हुआ है।
इसी धार्मिक वातावरण के बीच ग्राम मधोता के दुर्गा चौक में सार्वजनिक दुर्गोत्सव समिति द्वारा शारदीय नवरात्रि पर्व मनाया जा रहा है। यहां मां दुर्गा की स्थापना एवं आराधना का यह 16वां वर्ष है। नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु माता रानी की पूजा-अर्चना कर गांव, परिवार और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना कर रहे हैं। बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी के प्रति भी क्षेत्रवासियों की अटूट आस्था है।
समिति के पदाधिकारी संभाल रहे जिम्मेदारी
सार्वजनिक दुर्गोत्सव समिति के संरक्षक जगन्नाथ ठाकुर एवं लक्ष्मीनाथ मांझी हैं। अध्यक्ष खेतर सिंह ठाकुर, उपाध्यक्ष भकचंद नाग एवं जयदेव यादव, सचिव गुड्डू नाग, सह-सचिव रूपनारायण यादव, कोषाध्यक्ष जगदीश नाग, सह-कोषाध्यक्ष फरसू मांझी, मीडिया प्रभारी प्रेम जी सागर, व्यवस्था प्रभारी नड़गु राम नाग तथा पूजा प्रभारी पीलूराम नाग हैं। समिति के सभी सदस्य भी पर्व की व्यवस्थाओं में सहयोग कर रहे हैं।
मधोता की ऐतिहासिक पहचान, देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा और प्राकृतिक विरासत इसे बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ती है। दुर्गोत्सव का 16वां वर्ष इसी परंपरा, सामूहिक आस्था और धार्मिक उत्साह की निरंतरता का प्रतीक है।




