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छत्तीसगढ़ की कला-संस्कृति के पाठ पढ़ेंगे कक्षा 6वीं से 12वीं तक के विद्यार्थी, 100 विषयों पर तैयार होगी विशेष सामग्री

रायपुर, 24 अगस्त 2026

कक्षा 6वीं से 12वीं तक के विद्यार्थी पढ़ेंगे छत्तीसगढ़ की कला-संस्कृति के विशेष पाठ

छत्तीसगढ़ के स्कूली छात्र अब कक्षा 6वीं से 12वीं तक स्थानीय कला, संस्कृति, परंपराओं और लोकजीवन से जुड़े विशेष पाठ पढ़ेंगे। इस पहल का उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी माटी, सांस्कृतिक जड़ों और स्थानीय विरासत से गहराई से जोड़ना है।

छत्तीसगढ़ की समृद्ध कला, संस्कृति, इतिहास, धरोहर, स्थापत्य, लोक परंपराओं, गीत-संगीत, संतों, महापुरुषों और रचनाकारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा महत्वपूर्ण पहल की जा रही है।

SCERT में 24 से 26 अगस्त तक तीन दिवसीय आवासीय कार्यशाला

इस उद्देश्य से राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT), शंकर नगर, रायपुर में 24 से 26 अगस्त तक त्रि-दिवसीय आवासीय कार्यशाला आयोजित की जा रही है।

कार्यशाला में छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति पर केंद्रित आर्ट रिपोजिटरी तैयार करने के लिए प्रदेशभर के साहित्यकार, विषय-विशेषज्ञ, संस्कृतिविद, शोधकर्ता और जनसंचार विशेषज्ञ सहभागिता कर रहे हैं।

देश का पहला राज्य बनने की दिशा में छत्तीसगढ़

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप, छत्तीसगढ़ अपने संसाधनों से स्थानीय कला और सांस्कृतिक विरासत पर आधारित पूरक पाठ्य एवं दृश्य सामग्री विकसित करने वाला देश का पहला राज्य बनने की दिशा में अग्रसर है।

इस सामग्री के माध्यम से केवल कक्षा 6वीं से 12वीं तक के विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि शिक्षक, प्रशिक्षक, शैक्षिक प्रबंधक और पालक समुदाय भी स्थानीय कला-संस्कृति और विरासत से परिचित हो सकेंगे।

इस पहल का प्रमुख उद्देश्य विद्यार्थियों में अपनी स्थानीय धरोहरों के प्रति कलात्मक बोध, संवेदना और गौरव की भावना विकसित करना है।

100 विषयों पर तैयार होगी विशेष पाठ्य सामग्री

कार्यशाला में प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिष्ठित साहित्यकारों, विषय-विशेषज्ञों, संस्कृतिविदों, शोधकर्ताओं और जनसंचार विशेषज्ञों द्वारा छत्तीसगढ़ की संस्कृति, सभ्यता और कला से जुड़े करीब 100 विषयों पर लेखन और मार्गदर्शन किया जा रहा है।

इन विषयों को विभिन्न प्रमुख विधाओं में विभाजित कर विषयवार समूहों का गठन किया गया है। कार्यशाला का लक्ष्य विद्यार्थियों के लिए गुणवत्तापूर्ण और रोचक सामग्री तैयार करना है।

हर विषय पर 5 से 10 मिनट की लघु फिल्म भी बनेगी

इस पहल के तहत केवल लिखित पाठ्य सामग्री ही तैयार नहीं की जा रही है, बल्कि प्रत्येक विषय से संबंधित 5 से 10 मिनट की लघु फिल्मों के लिए पटकथा भी तैयार की जाएगी।

इससे विद्यार्थियों को छत्तीसगढ़ की कला और संस्कृति को दृश्य माध्यम से समझने का अवसर मिलेगा और सीखने की प्रक्रिया अधिक रोचक तथा प्रभावी बनेगी।

संतों, महापुरुषों और प्रदेश की विभूतियों को मिलेगा विशेष स्थान

प्रस्तावित आर्ट रिपोजिटरी में छत्तीसगढ़ की विभूतियों, संतों और महापुरुषों के योगदान को भी प्रमुखता से शामिल किया जाएगा।

इनमें लोमश ऋषि, वाल्मीकि, वल्लभाचार्य, गुरु घासीदास, नागार्जुन, श्रृंगी ऋषि, गहिरा गुरु, शबरी माता, राजा चक्रधर, पद्मश्री तीजन बाई, विनोद कुमार शुक्ल, तुलसीराम देवांगन, सुरुज बाई खांडे, माधवराव सप्रे, दाऊ कल्याण सिंह, मिनीमाता, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, मुकुटधर पाण्डेय, झाडूराम देवांगन, पं. सुंदरलाल शर्मा, धनी धर्मदास, शहीद वीर नारायण सिंह और गुंडाधुर सहित अनेक विभूतियों को शामिल किया गया है।

प्रमुख मंदिर, तीर्थ और स्थापत्य कला भी होंगे शामिल

छत्तीसगढ़ की स्थापत्य कला एवं धार्मिक धरोहरों के अंतर्गत कौशल्या मंदिर, सिरपुर, भोरमदेव, दंतेश्वरी मंदिर, बम्लेश्वरी मंदिर, चंद्रहासिनी मंदिर, मां महामाया मंदिर रतनपुर और राजीव लोचन मंदिर राजिम जैसे महत्वपूर्ण स्थलों पर भी सामग्री तैयार की जा रही है।

वहीं प्रदेश के विशिष्ट पंथों और परंपराओं में सतनाम पंथ, कबीर पंथ, रामनामी पंथ, घोटुल, मामा-भांजा, मितान-बदना, लमसेना और मानस मंडली को भी पाठ्य सामग्री का हिस्सा बनाया जाएगा।

हरेली से बस्तर दशहरा तक, पर्व-उत्सवों से रूबरू होंगे विद्यार्थी

छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्व और उत्सवों में हरेली, नवाखाई, बस्तर दशहरा, गोंचा पर्व, गौरी-गौरा, रथयात्रा, छेरछेरा, तीजा-पोला, भोजली और मड़ई सहित पारंपरिक खेल एवं गतिविधियों को शामिल किया गया है।

इससे विद्यार्थियों को प्रदेश के लोकजीवन और पारंपरिक उत्सवों को समझने का अवसर मिलेगा।

डोकरा आर्ट, गोदना और लोक शिल्प की भी होगी पढ़ाई

दृश्य कला एवं शिल्प के अंतर्गत डोकरा आर्ट, टेराकोटा, बांस शिल्प, लौह शिल्प, गोदना और रजवार भित्ति चित्रों पर विशेष सामग्री तैयार की जाएगी।

इसके माध्यम से नई पीढ़ी छत्तीसगढ़ की पारंपरिक कला विधाओं और स्थानीय शिल्पकारों की समृद्ध विरासत से परिचित हो सकेगी।

लोकगीत और पारंपरिक वाद्ययंत्रों को भी मिलेगा स्थान

लोक संगीत एवं वाद्ययंत्रों के अंतर्गत कबीर गायन, सुवा, डंडा, पंथी, भोजली, देवार, ददरिया, फाग, भरथरी, विवाह और चंदैनी गीतों को शामिल किया जाएगा।

इसके साथ ही मांदर, मोहरी, ढोल, बांसुरी, सारंगी, धनकुल और टिमकी जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की जानकारी भी विद्यार्थियों तक पहुंचाई जाएगी।

पंथी, राउत नाचा और पंडवानी से जुड़ेगी नई पीढ़ी

लोक नृत्य एवं रंगमंच की विधाओं में पंथी, राउत नाचा, गेड़ी, ककसाड़, गौर, शैला, सुवा, सरहुल नृत्य, नाचा और पंडवानी को शामिल किया जा रहा है।

इसके अलावा छत्तीसगढ़ की लोककथाओं और मौखिक परंपराओं को भी पाठ्य सामग्री में स्थान दिया जाएगा।

ठेठरी, खुरमी और फरा-मुठिया से परिचित होंगे विद्यार्थी

छत्तीसगढ़ की पारंपरिक पाक कला को भी इस विशेष सामग्री का हिस्सा बनाया जा रहा है। विद्यार्थियों को ठेठरी, खुरमी, फरा-मुठिया, अंगाकर रोटी, चौसेला, बफौरी, चापड़ा चटनी, माड़िया पेज और पपची जैसे पारंपरिक व्यंजनों की जानकारी दी जाएगी।

तीन दिनों में पाठ्य सामग्री से लेकर लघु फिल्म की स्क्रिप्ट तक होगा काम

कार्यशाला के प्रथम दिवस पाठ्य सामग्री का प्रस्तुतीकरण, विषयवार समीक्षा और समूह गठन किया जा रहा है।

द्वितीय दिवस 25 अगस्त को सामग्री का संशोधन और परिमार्जन, अंतिम ड्राफ्ट का निर्धारण तथा लघु फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट लेखन किया जाएगा।

वहीं, तृतीय दिवस 26 अगस्त को लघु फिल्मों की स्क्रिप्ट का प्रस्तुतीकरण, अंतिम संपादन, स्वीकृति और समापन सत्र आयोजित किया जाएगा।

नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ेगी आर्ट रिपोजिटरी

छत्तीसगढ़ की प्रस्तावित आर्ट रिपोजिटरी केवल पाठ्य सामग्री का संग्रह नहीं होगी, बल्कि यह प्रदेश की सांस्कृतिक स्मृतियों, लोकज्ञान, परंपराओं और कला विधाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनेगी।

इसके माध्यम से विद्यार्थी अपनी मिट्टी की कला, संस्कृति और विरासत को जानने के साथ उसके संरक्षण और संवर्धन के प्रति भी जागरूक होंगे। यह पहल छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को शैक्षणिक व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

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