बस्तर की परंपरा और आधुनिक शिक्षा का संगम: वल्लेकनार स्कूल में बच्चों को बांटी गई कलम-किताबें

अंतागढ़/कांकेर। बस्तर की समृद्ध परंपरा और आधुनिक शिक्षा के समन्वय का एक प्रेरक उदाहरण अंतागढ़ ब्लॉक के सेमरगांव में देखने को मिला, जहां सर्व आदिवासी समाज (कर्मचारी-अधिकारी प्रभाग) ने गोंडी विद्यालय ‘वल्लेकनार’ में नवप्रवेशित बच्चों को पेन, कॉपियां और पुस्तकें वितरित कर उनका उत्साहवर्धन किया।
यह आयोजन बस्तर के पारंपरिक उत्सव ‘पेनकडा जतरा करसाड़’ की पृष्ठभूमि में आयोजित किया गया, जिसका उद्देश्य बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के साथ-साथ अपनी मातृभाषा और संस्कृति के प्रति गर्व का भाव विकसित करना रहा। इस पहल के जरिए गोंडी, भतरी, दोरली, धुरवी और हल्बी जैसी स्थानीय बोलियों को संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश दिया गया।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा बच्चों की सीखने की क्षमता को बढ़ाती है और पुरखौती ज्ञान को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाती है। बस्तर की कई प्राचीन भाषाएं आज भी मौखिक परंपरा के रूप में ‘रेला पाटा’ के जरिए संरक्षित हैं, लेकिन अब इनके विलुप्त होने का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में इन भाषाओं और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए समाज के हर वर्ग को आगे आने की जरूरत है।
कार्यक्रम में समाज के कई प्रबुद्ध और जिम्मेदार पदाधिकारी शामिल हुए, जिनमें संभागीय अध्यक्ष तिरु प्रकाश ठाकुर, जिलाध्यक्ष बस्तर तिरु गंगा राम नाग, डॉ. जीवन सलाम, तिरु हेमंत बस्तरिया, तिरु माखन लाल होड़ी, मांझी राजेंद्र बघेल, किशोर मंडावी, प्रभुलाल नाग, आर. एल. वट्टी सहित अन्य पदाधिकारी और बड़ी संख्या में ग्रामीणजन मौजूद रहे।
“मीक वायना बुमकान ओंडले सेवा-जोहार” के साथ बच्चों का स्वागत किया गया। शाला प्रबंधन एवं विकास समिति के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि यदि समाज का कर्मचारी और अधिकारी वर्ग अपनी जड़ों से जुड़कर कार्य करे, तो बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और शिक्षा व्यवस्था दोनों को नई दिशा मिल सकती है।




