छत्तीसगढ़जगदलपुरबस्तर संभाग

बस्तर दशहरा में रथ चोरी की अनोखी परंपरा, 1700 देवी-देवताओं की विदाई की तैयारी, राष्ट्रपति के मुरिया दरबार पर सियासी सवाल,ग्रामीणों ने उठाए जमीन और पेयजल के मुद्दे

जगदलपुर,21 अक्टूबर 2026

बस्तर दशहरा: रथ चोरी में समानता का संदेश, 1700 से अधिक देवी-देवताओं की विदाई की तैयारी

छत्तीसगढ़ के बस्तर में विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा की अनूठी परंपराएं आज भी आदिवासी संस्कृति, सामाजिक समानता और सामुदायिक एकता का संदेश दे रही हैं। विजय रथ की चोरी की सदियों पुरानी परंपरा से लेकर 305 वर्षों से प्रज्वलित मां अन्नपूर्णा की ज्योति तक, यहां की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत विशेष पहचान रखती है। इस बीच, 24 अक्टूबर को होने वाली कुटुंब जात्रा में 1700 से अधिक देवी-देवताओं की विदाई की तैयारी की जा रही है।

वहीं, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के मुरिया दरबार में आगमन के निमंत्रण को लेकर राजनीतिक सवाल उठे हैं। दूसरी ओर, सुकमा के ग्रामीणों ने जमीन, पुनर्वास और सूखा राहत की मांग उठाई है, जबकि बस्तर के कुछ गांवों में पेयजल संकट और आदिवासी विश्राम भवन का अधूरा निर्माण भी चर्चा में है।

रथ चोरी की परंपरा में छिपा है सामाजिक समानता का संदेश

बस्तर दशहरा में विजय रथ को चुराने की परंपरा बेहद अनूठी है। भीतर रैनी के दिन मावली माता की परिक्रमा के बाद आठ पहियों वाले विजय रथ को माड़िया आदिवासी कुमड़ाकोट जंगल ले जाते हैं। यह स्थान जगदलपुर शहर से करीब तीन किलोमीटर दूर है।

मान्यता के अनुसार, पुराने समय में रथ खींचने वाले आदिवासियों को राजा के साथ बैठकर भोजन करने का अवसर नहीं मिलता था। इसे अपने सम्मान से जोड़ते हुए ग्रामीणों ने रथ चोरी की परंपरा शुरू की।

रथ को कुमड़ाकोट ले जाने के बाद राज परिवार को इसकी सूचना दी जाती है। इसके बाद बाहर रैनी के दिन राज परिवार वहां पहुंचता है और पारंपरिक झोपड़ी में नवाखानी की रस्म निभाता है। इस दौरान ग्रामीणों के साथ प्रसाद ग्रहण करने और उनका कुशलक्षेम पूछने की परंपरा भी निभाई जाती है।

इसके बाद माता दंतेश्वरी के छत्र को रथ पर विराजित कर राज परिवार सात परिक्रमा करता है और विजय रथ को वापस राजमहल के सामने लाया जाता है। यह परंपरा आदिवासी सम्मान, सामाजिक समानता और आपसी सद्भाव का प्रतीक मानी जाती है।

1700 से अधिक देवी-देवताओं की होगी विदाई

75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा में बस्तर संभाग और सीमावर्ती ओडिशा के गांवों से 1700 से अधिक देवी-देवता जगदलपुर पहुंचे हैं। इनके साथ करीब सात हजार सेवादार भी विभिन्न धार्मिक रस्मों में शामिल होने आए हैं।

अब 24 अक्टूबर को आयोजित होने वाली कुटुंब जात्रा में इन देवी-देवताओं को सम्मानपूर्वक विदाई दी जाएगी। गंगामुंडा स्कूल परिसर में होने वाले इस आयोजन में अगले वर्ष फिर आने का निमंत्रण दिया जाएगा। परंपरा के अनुसार, देवी-देवताओं की श्रेणी और रीति-रिवाजों के मुताबिक भेंट सामग्री भी उपलब्ध कराई जाती है।

जिला प्रशासन की ओर से देवी-देवताओं और उनके सेवादारों के ठहरने की व्यवस्था की गई है। पुराने तहसील कार्यालय स्थित भंडारगृह से पूजन सामग्री और राशन भी वितरित किया जा रहा है।

305 वर्षों से प्रज्वलित है मां अन्नपूर्णा की ज्योति

बस्तर दशहरा की धार्मिक परंपराओं में मां अन्नपूर्णा के नाम से प्रज्वलित ज्योति का विशेष महत्व है। जगदलपुर के दशहरा भंडारगृह में यह परंपरा करीब 305 वर्षों से चली आ रही है।

मान्यता है कि इस ज्योति के माध्यम से दशहरा के दौरान अन्न और आवश्यक सामग्री की कमी नहीं होने की कामना की जाती है। रियासतकाल में ग्रामीण राज परिवार को चावल, दाल और दूसरी आवश्यक सामग्री भेंट करते थे। सामग्री को टाकोली और नकद राशि को बिसहा पैसा कहा जाता था।

ग्रामीणों से प्राप्त सामग्री भंडारगृह में सुरक्षित रखी जाती थी और इसकी व्यवस्था संभालने वाले व्यक्ति को भंडारी कहा जाता था। आज भी यहां से दशहरा में शामिल होने वाले देवी-देवताओं के सेवादारों को राशन और पूजन सामग्री उपलब्ध कराई जाती है।

राष्ट्रपति के मुरिया दरबार के निमंत्रण पर सियासी सवाल

बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के प्रस्तावित आगमन को लेकर निमंत्रण पत्र पर राजनीतिक विवाद सामने आया है।

बस्तर विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस विधायक लखेश्वर बघेल ने निमंत्रण पत्र में स्थानीय आदिवासी जनप्रतिनिधियों और समाज प्रमुखों के नाम शामिल नहीं होने पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि इतने महत्वपूर्ण पारंपरिक आयोजन में स्थानीय प्रतिनिधियों और समाज प्रमुखों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

मुरिया दरबार बस्तर की पारंपरिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहां आदिवासी समाज के प्रतिनिधि अपनी बात रखते हैं। ऐसे में निमंत्रण प्रक्रिया और अतिथियों की सूची को लेकर सवाल उठे हैं।

हालांकि, निमंत्रण पत्र में नाम नहीं होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित लोगों को आमंत्रित नहीं किया गया। इस मामले में जिला प्रशासन, संस्कृति विभाग और बस्तर दशहरा समिति का आधिकारिक स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण होगा।

जमीन, पुनर्वास और सूखा राहत को लेकर ग्रामीणों की नाराजगी

सुकमा जिले के कोंटा ब्लॉक के अंदरूनी गांवों में जमीन, वन अधिकार पट्टे, पुनर्वास और सूखा राहत को लेकर ग्रामीणों ने नाराजगी जताई है।

ग्राम पंचायत गंगलेर में बस्तरिया राज मोर्चा के नेतृत्व में आयोजित आमसभा में गंगलेर, सिंगाराम, गोल्लापल्ली, माराईगुड़ा और किस्टाराम पंचायतों के ग्रामीणों ने अपनी समस्याएं रखीं।

ग्रामीणों का आरोप है कि पात्र परिवारों को वन अधिकार पट्टे नहीं मिले हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पंचायत की अनुमति के बिना पुश्तैनी खेती की जमीन पर सीपीटी कार्य के नाम पर खुदाई की गई।

इसके अलावा, पोलावरम परियोजना से प्रभावित होने वाले 18 गांवों के पुनर्वास को लेकर चिंता जताई गई। ग्रामीणों ने मांग की कि विस्थापन से पहले पुनर्वास स्थल, कृषि भूमि और जरूरी बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था स्पष्ट की जाए।

बारिश की कमी से फसल प्रभावित होने के बावजूद सूखा राहत को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए जाने पर भी नाराजगी सामने आई। ग्रामीणों ने सड़क, बिजली, पेयजल, पुल-पुलिया, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को प्राथमिकता देने की मांग की।

बदबूदार हैंडपंप के पानी से परेशान ग्रामीण

बस्तर ब्लॉक की रतेंगा ग्राम पंचायत के सालेभाटा पारा में पेयजल संकट ग्रामीणों की परेशानी बढ़ा रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, गांव के हैंडपंप से निकलने वाले पानी में दुर्गंध आती है, जिसके कारण वे इसका इस्तेमाल पीने के लिए नहीं कर पा रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि पीने और खाना बनाने के लिए उन्हें खेतों में बने झरिया के पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है। रतनी नाग, सुकाली और बसंती कश्यप सहित ग्रामीणों ने बताया कि समस्या लंबे समय से बनी हुई है।

पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण गर्मी के दिनों में जलस्तर घटने से परेशानी और बढ़ जाती है। ऐसे में हैंडपंप के पानी की गुणवत्ता की जांच और सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था जरूरी है, ताकि ग्रामीणों को दूषित पानी पर निर्भर न रहना पड़े।

अधूरा पड़ा आदिवासी विश्राम भवन

बस्तर दशहरा में शामिल होने के लिए दूरदराज के गांवों से हजारों आदिवासी जगदलपुर पहुंचते हैं। लेकिन शहर में प्रस्तावित आदिवासी विश्राम भवन का निर्माण अब तक पूरा नहीं हो सका है।

जानकारी के अनुसार, बजट की कमी के कारण लोक निर्माण विभाग ने भवन की नींव तैयार करने के बाद निर्माण कार्य रोक दिया। इससे ग्रामीणों को ठहरने की सुविधा मिलने का इंतजार बना हुआ है।

दशहरा के दौरान कई ग्रामीण धार्मिक रस्मों में शामिल होने के लिए एक से अधिक दिन तक शहर में रुकते हैं। इसके अलावा इलाज, सरकारी कामकाज और सामाजिक आयोजनों के लिए भी उन्हें जगदलपुर आना पड़ता है।

ऐसे में विश्राम भवन का निर्माण पूरा होने से दूरदराज के गांवों से आने वाले लोगों को सालभर सुविधा मिल सकती है। फिलहाल बजट उपलब्ध कराकर निर्माण कार्य दोबारा शुरू करना संबंधित विभाग और प्रशासन के सामने चुनौती बना हुआ है।

बस्तर दशहरा जहां अपनी प्राचीन परंपराओं और आदिवासी संस्कृति के लिए देश-दुनिया में पहचान रखता है, वहीं जमीन, पेयजल, पुनर्वास और ठहरने की सुविधाओं से जुड़े मुद्दे क्षेत्र के विकास की जरूरतों को भी सामने लाते हैं।

Related Articles

Back to top button
You Cannot able to copy the content! All Reserved Rights of Bastar Dagar