बकावंड ब्लॉक के झारउमर गांव में परंपरा और आस्था का अद्भुत संगम: तीन माह तक चलने वाला बाली पर्व हर्षोल्लास के साथ जारी

,,नाकागुड़ा पारा में आदिकालीन परंपरा का निर्वहन, गांव की सुख-शांति और अच्छी फसल की कामना से देवी-देवताओं का आवाहन,,


बस्तर, बकावंड,। जिले के बकावंड ब्लॉक अंतर्गत झारउमर गांव के नाकागुड़ा पारा में बाली पर्व का शुभारंभ 28 जनवरी से विधिवत रूप से किया गया है। यह पर्व लगभग तीन माह तक, अप्रैल महीने तक चलेगा। आदिकाल से चली आ रही इस परंपरा को गांववासी आज भी पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ निभाते आ रहे हैं।
यह पर्व गांव की सुख-शांति, समृद्धि और अच्छी फसल की कामना के लिए मनाया जाता है। बाली पर्व के दौरान गांव की इष्ट देवी-देवताओं जैसे बारह भाई, भीमा-भीमसेन सहित अनेक देवी-देवताओं का विधिवत आवाहन किया जाता है। मान्यता के अनुसार, इन देवी-देवताओं की एक से अधिक पत्नियां होती हैं, जिनकी परंपरागत पूजा-अर्चना की जाती है।
इस आयोजन की विशेषता यह है कि गांव में पुनः देवी-देवताओं को “चढ़ाया” जाता है। साथ ही आसपास के अन्य गांवों के देवी-देवताओं को भी आमंत्रित किया जाता है। इस दौरान 05 वर्ष से 16 वर्ष तक के बालक-बालिकाओं पर देवी-देवताओं का आवेश आने की परंपरा भी निभाई जाती है, जो बस्तर की अनूठी सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती है।
ग्रामीणों का कहना है कि पूर्वजों से चली आ रही इस परंपरा को आज भी उसी श्रद्धा से संजोकर रखा गया है, ताकि आने वाली पीढ़ी इसे समझ सके और आगे बढ़ा सके। बस्तर अंचल देवी-देवताओं और अद्भुत शक्तियों के लिए जाना जाता है, और यही परंपराएं इसे विशिष्ट बनाती हैं।
इस पूरे आयोजन को सफल बनाने में ग्राम पंचायत के सरपंच खगेश्वर कर्मा का विशेष योगदान रहा है, जिन्होंने समस्त ग्रामवासियों को एकजुट कर इस परंपरा को जीवंत बनाए रखा है।
इस अवसर पर सोमदास कश्यप, कँवल साय कश्यप, विजय बघेल, देबो बघेल, जगबंधु बघेल, दलपती कश्यप, सामु बघेल, बुद्दू, रुकधर, सोनधर, सामो घनो, बोले नाग सहित बड़ी संख्या में ग्रामीणजन उपस्थित रहे।
बस्तर की धरती पर आज भी आदिवासी परंपराएं जीवंत हैं और बाली पर्व जैसे आयोजन इस बात का प्रमाण हैं कि आधुनिकता के बीच भी बस्तर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से मजबूती से जुड़ा हुआ है। झारउमर गांव का यह आयोजन न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत के रूप में भी संजोया जा रहा है।




