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तांत्रिक अनुष्ठान से गूंजा बस्तर दशहरा, देवी आराधना के महापर्व में दी गई बकरों की बलि

जगदलपुर। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा अपनी अनूठी परंपराओं और रहस्यमयी रस्मों के लिए जाना जाता है। इन्हीं प्राचीन परंपराओं में से एक है तांत्रिक पूजा अनुष्ठान, जो देवी-देवताओं को प्रसन्न करने और बस्तर को बुरी आत्माओं से बचाने की प्रार्थना के साथ संपन्न किया जाता है।

बीती रात अष्टमी और नवमी तिथि के बीच आयोजित निशा जात्रा के दौरान बस्तर राजवंश के कुलदीपक राजा कमलचंद भंजदेव ने परंपरा अनुसार इस तांत्रिक पूजा अनुष्ठान की रस्म पूरी की। देवी को प्रसन्न करने के लिए इस अवसर पर भोग अर्पित किया गया और बकरों की बलि भी दी गई।

बताया जाता है कि यह रस्म बीते 600 वर्षों से बस्तर राजवंश द्वारा निभाई जाती आ रही है। इस अनुष्ठान में राज परिवार के सदस्य, मां दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी और अन्य लोग शामिल होते हैं। देर रात राजा कमलचंद भंजदेव राज परिवार व श्रद्धालुओं के साथ पैदल यात्रा करते हुए अनुपमा चौक स्थित गुड़ी मंदिर पहुंचे, जहां पूजा-अर्चना और बलि की परंपरा निभाई गई।

बस्तर दशहरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि देवी आराधना का महापर्व है। इसे बस्तर संभाग की प्रथम पूज्यनीया माई दंतेश्वरी को समर्पित माना जाता है। इस महापर्व के दौरान बस्तर के सभी देवी-देवताओं का आगमन होता है और उनके लिए विशेष पूजा-अर्चना तथा परंपरागत अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।

बस्तर दशहरा का यह तांत्रिक अनुष्ठान न केवल श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है, बल्कि जनमानस में अदृश्य शक्तियों के संरक्षण और देवी कृपा की परंपरा को भी जीवंत बनाए रखता है।

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