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बस्तर दशहरा में ‘कुटुंब जात्रा’ रस्म के साथ देवी-देवताओं को ससम्मान विदाई, 600 साल पुरानी परंपरा की रही झलक

जगदलपुर, 5 अक्टूबर 2025। विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा पर्व की एक और महत्वपूर्ण रस्म, ‘कुटुंब जात्रा’, रविवार को स्थानीय महात्मा गांधी स्कूल परिसर के गुड़ी में विधिवत संपन्न हुई। इस अवसर पर बस्तर संभाग एवं पड़ोसी राज्यों ओडिशा और महाराष्ट्र के समीपवर्ती गांवों से आए हजारों देवी-देवताओं के छत्र और डोली को बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने पूजा-अर्चना के साथ ससम्मान विदा किया। यह रस्म 75 दिनों तक चलने वाले बस्तर दशहरा पर्व की समाप्ति की ओर इशारा करती है।

600 साल से अधिक पुरानी परंपरा:
बस्तर दशहरा की खासियत यह है कि केवल इसी पर्व में इतने बड़ी संख्या में गांव-गांव के देवी-देवताओं के छत्र और डोली शामिल होते हैं। रियासत काल से चली आ रही इस परंपरा में राजपरिवार के सदस्य और दशहरा समिति गांव-गांव से आए देवी-देवताओं और उनके पुजारियों को राजा-महाराजाओं की तरह विधि-विधान से ससम्मान विदा करते हैं।

‘रूसूम’ के साथ दी गई विदाई:
परंपरा के अनुसार, दशहरा में शामिल सभी देवी-देवताओं को ‘रूसूम’ (दक्षिणा/भेंट) दी गई। कमलचंद भंजदेव और दशहरा समिति ने छत्र और डोली लेकर पहुंचे पुजारियों को कपड़े, पैसे और मिठाइयां देकर उनका सम्मान किया। गंगामुण्डा वार्ड के देवगुड़ी में श्रद्धालुओं ने अपनी मनोकामना अनुसार देवी-देवताओं को भेंट अर्पित की।

इस दौरान पूरे परिसर में देवी-देवताओं का आपस में मेल-मिलाप, लाठ, डोली के साथ झूमते सिरहा और विभिन्न क्षेत्रों के आंगादेव का खेल देखने को मिला। स्थानीय और आसपास के गांवों से आए श्रद्धालुओं ने भी देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना कर उनका आशीर्वाद लिया। माहौल पूरी तरह भक्ति भावना में डूबा रहा।

बस्तर दशहरा की इस रस्म ने परंपरा, संस्कृति और भक्ति का अद्भुत संगम पेश किया।

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