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पत्रकारों को रोकने की कोशिश, फिर भी उजागर हुई हकीकत — “बस्तर डगर” टीम ने खोली छात्रावासों की लापरवाही की पोल

“बस्तर डगर” टीम ने खोली छात्रावासों की लापरवाही की पोल”

डमरू कश्यप,बस्तर। आदिवासी बच्चों के भविष्य को सुधारने के लिए बनाए गए छात्रावास अब खुद उनकी परेशानियों का केंद्र बन गए हैं। परिजनों से लगातार मिल रही शिकायतों के बाद “बस्तर डगर” की टीम जब हकीकत जानने के लिए मैदान में उतरी, तो सामने आई तस्वीर प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार की गवाही दे रही थी।

टीम ने जब जिले के विभिन्न छात्रावासों का निरीक्षण किया, तो पाया कि कई इमारतें जर्जर हालत में हैं। दीवारों में दरारें, टूटी खिड़कियाँ और गंदगी से भरे शौचालय बच्चों के स्वास्थ्य और सुरक्षा दोनों के लिए खतरा बन गए हैं। कई जगह शौचालयों में दरवाजे तक नहीं लगे थे, जिससे बच्चों की निजता पूरी तरह से भंग हो रही है।

“पत्रकारों को रोकने की कोशिश”

“बस्तर डगर” की टीम जब कुछ छात्रावासों के अंदर पहुंची, तो अधीक्षकों ने उन्हें प्रवेश से रोकने की कोशिश की। उनका कहना था कि “अधिकारियों के निर्देश हैं कि किसी भी पत्रकार को छात्रावास में जाने की अनुमति नहीं है।”
लेकिन टीम ने अपने दृढ़ संकल्प और लगातार प्रयासों से आखिरकार अंदर की सच्चाई को उजागर किया।

“बच्चों के भोजन और सुविधाओं में भारी लापरवाही”

निरीक्षण के दौरान यह भी सामने आया कि बच्चों को मीनू चार्ट के अनुसार भोजन नहीं दिया जा रहा है। कई बार उन्हें अधपका खाना या केवल दाल-भात परोसा जाता है। वहीं, पंखे खराब पड़े हैं, बिजली के तार खुले हुए हैं और इलेक्ट्रिक बोर्ड उखड़े हुए हैं — जिससे किसी बड़ी दुर्घटना का खतरा हमेशा बना रहता है।

“लाखों के बजट के बाद भी नहीं सुधार”

हर साल सरकार की ओर से छात्रावासों के रखरखाव, साफ-सफाई और भोजन के लिए लाखों रुपये आवंटित किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही और अधीक्षकों की मनमानी से सरकारी योजनाएं केवल फाइलों तक सीमित रह गई हैं।

“कई ब्लॉकों में अव्यवस्था की बाढ़”

बस्तर, दरभा, तोकापाल, लोहंडीगुड़ा, बकावंड और करपावंड जैसे ब्लॉकों के छात्रावासों की स्थिति बेहद चिंताजनक है।
बस्तर के प्री-मैट्रिक बालक छात्रावास लामकेर, बालक आश्रम शाला बाघनपाल (लोहंडीगुड़ा) और 50 सीटर प्री-मैट्रिक आदिवासी बालक छात्रावास तारागांव में आदिवासी बच्चों के साथ सीधे तौर पर लापरवाही और उपेक्षा देखने को मिली।

“प्रशासनिक जवाब टालमटोल भरे”

जब इस पूरे मामले पर बस्तर मंडल संयोजक से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा — “मुझे इस विषय पर कोई जानकारी नहीं है।”
वहीं अधीक्षकों द्वारा पत्रकारों को रोके जाने पर उन्होंने सफाई दी — “हमारी समिति या किसी सदस्य ने पत्रकारों को रोकने का निर्देश नहीं दिया।”
अब सवाल यह है कि अगर किसी ने रोका नहीं, तो पत्रकारों को अंदर जाने से क्यों रोका गया? क्या इसके पीछे कोई बड़ा अधिकारी या रसूखदार व्यक्ति है?

“जांच और कार्रवाई की मांग”

मामला अब प्रशासनिक जांच की मांग कर रहा है। जिला प्रशासन को तुरंत संज्ञान लेकर दोषियों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि आदिवासी बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सके और सरकारी धन के दुरुपयोग पर रोक लगाई जा सके।

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