मावली माता की विदाई परंपरा को जनसहभागिता से मिला भव्य स्वरूप

गणेश शंकर मिश्रा के कलेक्टर कार्यकाल में हुई थी विशेष पहल, मंदिर परिसर में बना था विशेष मंच; आज भी कायम है आकर्षक सजावट और व्यवस्थाओं की परंपरा
जगदलपुर, 27 अक्टूबर 2026
बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यहां की समृद्ध लोकसंस्कृति, परंपराओं और जनआस्था का जीवंत प्रतीक है। इस ऐतिहासिक पर्व की प्रत्येक परंपरा अपने आप में विशिष्ट महत्व रखती है। इन्हीं परंपराओं में मावली माता की डोली एवं दंतेश्वरी माई के छत्र की भव्य विदाई का आयोजन विशेष स्थान रखता है। इस आयोजन को अधिक भव्य और जनसहभागिता से जोड़ने की दिशा में छत्तीसगढ़ राज्य नीति आयोग के उपाध्यक्ष गणेश शंकर मिश्रा ने अपने कलेक्टर कार्यकाल के दौरान महत्वपूर्ण पहल की थी।
मावली माता की विदाई बस्तर दशहरा का एक अत्यंत भावनात्मक और आस्थापूर्ण अवसर होता है। इस परंपरा की गरिमा को व्यापक स्वरूप देने तथा अधिक से अधिक श्रद्धालुओं को आयोजन से जोड़ने के उद्देश्य से मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर में विशेष मंच का निर्माण कराया गया था। इस व्यवस्था का उद्देश्य था कि आम नागरिक और श्रद्धालु विदाई समारोह को करीब से देख सकें और इस ऐतिहासिक धार्मिक परंपरा के साक्षी बन सकें।
इस वर्ष बस्तर राज परिवार के विशेष आग्रह एवं आमंत्रण पर गणेश शंकर मिश्रा भी मावली माता की डोली एवं दंतेश्वरी माई के छत्र की विदाई के पावन आयोजन में शामिल हुए। उनकी यह सहभागिता बस्तर की परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक आस्था के प्रति उनके जुड़ाव को दर्शाती है।
विदाई मार्ग को भी दिया गया था आकर्षक स्वरूप
इस पहल के अंतर्गत मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर से जिया डेरा तक मावली माता की विदाई के संपूर्ण मार्ग को आकर्षक ढंग से सजाने और श्रद्धालुओं की सुविधा के अनुरूप आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने पर भी विशेष ध्यान दिया गया था। मार्ग की साज-सज्जा, आयोजन की गरिमा के अनुरूप व्यवस्थाएं और आमजन की सहभागिता ने विदाई समारोह को और अधिक भव्य एवं यादगार स्वरूप प्रदान किया।
इस पहल से विदाई समारोह केवल एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह जनआस्था, सामूहिक सहभागिता और बस्तर के सांस्कृतिक गौरव को अभिव्यक्त करने वाला महत्वपूर्ण अवसर बनकर उभरा।
आज भी कायम है पहल की परंपरा
इस पहल की विशेषता यह है कि उस समय विकसित की गई व्यवस्थाओं का प्रभाव आज भी देखने को मिल रहा है। मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर से जिया डेरा तक मावली माता की विदाई के मार्ग पर आकर्षक सजावट और श्रद्धालुओं की सुविधा से जुड़ी व्यवस्थाओं की परंपरा निरंतर जारी है। यह दर्शाता है कि संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित करने के लिए की गई सार्थक पहल समय के साथ स्थायी पहचान भी बना सकती है।
बस्तर दशहरा की पहचान यहां की अनूठी परंपराओं, जनआस्था और सामूहिक सहभागिता में बसती है। मावली माता की डोली और दंतेश्वरी माई के छत्र की विदाई को भव्य स्वरूप देने की यह पहल इस बात का उदाहरण है कि प्रशासनिक दूरदर्शिता और सांस्कृतिक संवेदनशीलता के समन्वय से विरासत को नई पहचान दी जा सकती है। ऐसी पहलें न केवल वर्तमान पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी बस्तर की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को संजोने का मार्ग प्रशस्त करती हैं।




